सरकारी सौजन्य से सरकारी ख़ज़ाने की लूट-खसोट

प्रोफेसर हनुमाना राम ईसराण

(पूर्व प्राचार्य ,कॉलेज शिक्षा ,राजस्थान)

 


” All that glitters is not gold.” चमकने वाली हर चीज़ सोना नहीं होती। यह कथन शेक्सपियर का है।
जिन लोकलुभावन योजनाओं का सरकार बड़े धूम- धड़ाके से प्रचार- प्रसार कर रही है, उनमें से अधिकांश तो निजी कंपनियों और कॉरपोरेट घरानों को चोर दरवाज़े से फ़ायदा पहुंचाने के मक़सद से लॉन्च की गईं हैं। करदाताओं द्वारा चुकाई गई धनराशि बीमा कंपनियों को लुटाकर सरकार वाह-वाही लूट रही है। ‘पहली बार, पहली बार’ का झुनझुना बजाकर लुटेरों से देश और आमजन को दिन-दहाड़े लुटाया जा रहा है। स्वांग काल के इस स्वर्ण युग में हरामखोरी करने वाले हज़ूरीये, हाज़रिये, हुंकारिये एकजुट होकर प्रधान सेवक की सेवा/स्तुति गान कर उसे मदमस्त रखे हुए हैं और आमजन के मुंह से निवाला छीनकर मेवा खा रहे हैं। लुटेरे देशभक्ति का तमगा धारण कर देश व आमजन को लूट कर फिफ्टी-फिफ्टी का खेल खेल रहे हैं। आधे पर कब्ज़ा लूटने वाले घराने का तो आधा लूटने की छूट देने वाले पक्ष को। तभी तो लूट का माल लुटाकर अगले फिफ्टी साल तक राज पर कब्ज़ा क़ायम रखना संभव हो सकेगा। याद रखिए, सौदागरों की सरकार अपना नफा -नुकसान देखकर हर सौदा तय करती है।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और आयुष्मान भारत योजनाओं की ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि सत्ता की गोद में बैठकर बीमा कंपनियाँ और कॉरपोरेट घराने किस तरह भोले-भाले किसानों व लाचार रोगियों का शोषण करने के साथ- साथ देश के ख़ज़ाने को सरेआम लूट रहे हैं। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के नाम पर किसानों के साथ किए जा रहे छल -कपट को इससे पहले की पोस्ट में उज़ागर किया जा चुका है। आज जानिए जन- स्वास्थ्य की ‘आयुष्मान भारत योजना’ की हक़ीक़त और इससे आलिंगनबद्ध संभावित खतरों के बारे में।

आयुष्मान भारत योजना क्या है?
आयुष्मान भारत योजना भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से शुरू की गई स्वास्थ्य बीमा योजना (Health Insurance Scheme) है। 1 फरवरी 2018 को केंद्र सरकार का बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री अरुण जेटली ने इस योजना का उल्लेख करते हुए कहा कि इस योजना के अन्तर्गत चयनित परिवार के सदस्य प्रति वर्ष पांच लाख रुपए तक का इलाज चुनिंदा अस्पतालों में मुफ्त में करा सकेंगे।

आयुष्मान भारत योजना पर होने वाले व्यय को राज्य और केंद्र सरकार आपस में बांटेंगी। योजना में राज्य की हिस्सेदारी जरूरी है। यह नई योजना गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के लिए सन 2008 में शुरू की गई राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना की जगह लाई गई है, जिसमें तीस हजार रुपये का सालाना कवर दिया जाता था। इस योजना में केंद्र प्रायोजित पुरानी योजनाएं ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना’ तथा ‘वरिष्ठ नागरिक स्वास्थ्य बीमा योजना’ समाहित होंगी।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा दवारा शुरू की गई ऐसी ही स्वास्थ्य योजना “ओबामाकेयर (Obamacare)” की तर्ज पर मोदी सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना को इसके उद्धघाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री ख़ुद ही ने इसके लिए ”मोदीकेयर (Modicare)” का नाम उछालकर गोदी मीडिया को इशारा कर दिया है कि वे इसे इस नाम से प्रचारित करें। आयुष्मान भारत योजना ( ABY ) का विधिवत उद्धघाटन प्रधानमंत्री मोदी ने 23 सितंबर 2018 को रांची, झारखंड में किया है। यह योजना पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयन्ती 25 सितंबर से प्रभावी हो रही है। केंद्र सरकार इस योजना के तहत देश के लगभग 10 करोड़ चयनित परिवारों को सालाना 5 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध करवा रही है।

जनता के धन से शुरू की गई किसी भी योजना के लिए ‘मैं’ रोग से ग्रसित और खुद की जय बुलवाने में माहिर महाशय ने इस योजन के लिए जो वेबसाइट शुरू की है उसका नाम mera.pmjay..gov.in रखा है ताकि पात्रताधारी हर परिवार ‘मेरा पीएम जय’ के मंत्र से परिचित हो सके।

लाभान्वित
आयुष्मान भारत-राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना ( Ayushman Bharat National Health Protection Mission (ABNHPM) का लाभ देश के 11.74 करोड परिवारों को देने का लक्ष्य रखा गया है। हर परिवार में 5 सदस्यों का औसत माना जाए तो देश की 50 करोड़ से ज्यादा की आबादी इसके दायरे में आती है।

पात्रता आधारित इस योजना में ग्रामीण क्षेत्रों के सुविधाहीन परिवारों (deprived rural families) और शहरी क्षेत्रों के भी कुछ तय पेशों में लगे परिवार (Identified occupational category of urban workers’ families) शामिल किए जाएंगे।
सन 2011 की सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (Socio-Economic Caste Census (SECC)) में गरीब के तौर पर चिन्हित किए गए लोगों को इस योजना का पात्र माना गया है। मतलब 2011 के बाद ग़रीबी की गिरफ्त में आया हुआ व्यक्ति इस बीमा कवर से वंचित हो जाएगा।
SECC data के बाद हुए बदलावों को ध्यान में रखते हुए ऐसे सुविधाहीन या छोटे पेशों में लगे परिवारों को शामिल करने (inclusion) या बाहर करने (exclusion) के विकल्प रखे जाएंगे।

पात्रता आधारित इस योजना में प्रतिवर्ष प्रति परिवार को पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा कवर मुहैया करवाया गया है। इस योजना से जुड़ रहे 27 राज्यों में कुल मिलाकर 15 हज़ार निजी और सरकारी अस्पतालों दोनों में करीब एक लाख आयुष्मान मित्रों को तैनात करने की बात कही गई है। इन आयुष्मान मित्रों की भर्ती की क्या प्रक्रिया होगी, यह स्पष्ट नहीं है। इसमें मनमर्जी का खेल खेले जाने की पूरी संभावना है। इस योजना के लिए आवंटित बजट की अधिकांश राशि तो इन आयुष्मान मित्रों के वेतन व भत्तों पर ही व्यय हो जाएगी। फिर इलाज़ पर होने वाले व्यय की भरपाई बीमा कंपनियों को कैसे होगी, यह बहुत बड़ा प्रश्न है?

इस योजना में पैकेज दर के आधार पर इलाज के लिए भुगतान किया जाएगा। पैकेज दर में इलाज से संबंधित सभी लागत शामिल होंगी। जानकर लोगों का मानना है कि विभिन्न बीमारियों के लिए पैकेज तय किया है, वह व्यवहारिक नहीं है। इसलिए जब यह योजना जमीन पर उतरेगी तब पैकेज को लेकर भी कई अड़चनें खड़ी होंगी। जैसे कुछ दिन पूर्व भामाशाह स्वास्थ्य योजना में कंपनियों ने अचानक अस्पतालों को भुगतना करने से मना करने के कारण काफ़ी अफरा-तफ़री मची थी, ऐसी ही प्रकरण इसमें उपस्थित होंगे। ऐसी परिस्थितियों से निपटने की कोई व्यवस्था इस योजना में नहीं कि गई है। पैकेज को लेकर निजी अस्पतालों व बीमा कंपनियों के बीच रस्सा-कस्सी चलेगी, उसका खामियाज़ा ग़रीब रोगी को भुगतना पड़ेगा।

स्वकल्याण व पूंजीपतियों के प्रति प्रतिबद्ध सरकार

एक लोककल्याणकारी सरकार का दायित्व व धर्म तो यह होता है कि वह ग़रीब और बेसहारा रोगियों की समुचित चिकित्सा व्यवस्था सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क मुहैया करवाए। इसके लिए कम से कम तहसील व जिला स्तर के सरकारी अस्पतालों में समुचित स्टाफ उपलब्ध करवाकर आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था करे। परन्तु चालक राजनेताओं व नोकरशाहों ने मिलीभगत कर सरकारी खज़ाना बीमा कंपनियों व निजी अस्पताल-तंत्र को लुटाने व उसमें से अपना हिस्सा बटोरने की तिकड़म बैठा ली है और वो भी गरीब के नाम की आड़ लेकर। यह अंदेशा ही नहीं बल्कि पूरी संभावना है कि निजी अस्पताल तंत्र व बीमा कंपनियां हर प्रकार का हथकंडा अपनाकर जिस पात्रताधारी परिवार में कोई रोगी नहीं होगा तो भी उसके इलाज़ के नाम पर फर्जीवाड़ा अंज़ाम देकर सरकारी ख़ज़ाने को चपत लगाते रहेंगे। स्वास्थ्य बीमा स्मार्ट कार्डधारी को कुछ प्रलोभन देकर उस कार्ड से इलाज़ के नाम पर राशि हड़पने के मामले भी सामने आएंगे। अगर यह योजना सरकारी अस्पतालों तक सीमित रहती तो इस पर काफ़ी हद तक नियंत्रण रखा जा सकता था। निजी बीमा कंपनियों व निजी अस्पताल की यह जुगल जोड़ी ख़ूब जमेगी। राजनेताओं व नोकरशाहों की छत्रछाया में यह जोड़ी जमी है। इसलिए ख़ूब गुल खिलेंगे। जब सैयां भये कोतवाल तो डर काहे का होय।

आयुष्मान भारत योजना की हक़ीकत व इसकी परिणीति से अवगत होने के लिए डॉ हेमंत कुमार झा की टाइम लाइन से साभार ली गई पोस्ट पढ़िए। इसमें निहित चेतावनी को समझने की कोशिश कीजिए। यह भी जान लीजिए कि गरीबों की आड़ लेकर सरकारें कॉरपोरेट घरानों के हितों की पैरवी करने के साथ- साथ उन्हें बढ़ावा देती रही हैं। नाम गरीब व किसान-मजदूर का, विकास कॉरपोरेट घरानों का। यही सब कुछ होता रहा है। यह योजना भी इसी तर्ज़ पर बनाई गई है।

आयुष्मान भारत योजना” आकर्षक पैकिंग में शताब्दी का सबसे बड़ा छलावा है। गरीबों के इलाज के नाम पर बीमा कंपनियों और निजी अस्पतालों की लूट का एक ऐसा सिलसिला शुरू होने वाला है जिसे नियंत्रण में लाना व्यवस्था के लिये संभव नहीं रह जाएगा।

सार्वजनिक स्वास्थ्य को कारपोरेट सेक्टर के हवाले करने के कितने बड़े खतरे हैं इस पर बहस होनी चाहिये थी। लेकिन, जैसा कि माहौल है, इन जरूरी मुद्दों पर बहस नहीं होती। इतना बड़ा देश है, इतने सारे मुद्दे हैं, बहस के नए-नए मुद्दों को जन्म देने में इतनी सारी शक्तियां लगी हुई हैं तो शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दों पर कौन बहस करे।

एक गरीब, जो 5 लाख रुपये के स्वास्थ्य बीमा का लाभार्थी है, अस्पताल में भर्त्ती होता है। उसे क्या हुआ है यह अस्पताल को तय करना है। इलाज का बिल बीमा कंपनी को भरना है। बीच में दवा कंपनियां हैं जिनके अपने दांव हैं। इस बात की कोई गारंटी नहीं कि जहां खर्च 25 हजार है वहां 2 लाख का बिल नहीं बनाया जाएगा। डॉक्टर समुदाय की अपनी विवशताएं हैं और उनमें से बहुत सारे कारपोरेट के दलाल बन कर काम करते हैं।
इस बीमा योजना के तहत सिर्फ सरकारी अस्पताल ही नहीं, निजी अस्पताल भी सूचीबद्ध किए जाएंगे। वैसे भी, सरकारी स्वास्थ्य संरचना के भग्नावशेषों पर फलता-फूलता निजी अस्पताल-तंत्र ही ‘न्यू इंडिया’ का भविष्य है।

25 सितंबर से औपचारिक रूप से शुरू होने वाली इस बीमा योजना में मार्च, 2020 तक के लिये 85 हजार करोड़ रुपये का प्रीमियम होगा। उसके बाद तो हर वर्ष 10 करोड़ परिवारों यानी कि लगभग 50 करोड़ लोगों के स्वास्थ्य बीमा के नाम पर न जाने कितने हजार करोड़ रुपये बीमा कंपनियों को प्रीमियम के नाम पर दिये जाएंगे। जैसे…फसल बीमा के नाम पर दिये गए थे… और यह कोई छुपा तथ्य नहीं है कि किसानों को क्या मिला और बीमा कंपनियों ने फसल बीमा के नाम पर कितनी भयानक लूट मचाई।

दरअसल, यह जो हम “विदेशी निवेश-विदेशी निवेश” का मंत्र जपते रहते हैं और सरकारें गर्व से बताती हैं कि पिछली तिमाही में इतना विदेशी निवेश आया, उनमें अधिकांश निवेश विदेशी वित्तीय और बीमा कंपनियों का आता है। उन्हें पता है कि भारत में बीमा का उभरता हुआ बहुत बड़ा बाजार है और इस क्षेत्र में अकूत लाभ की गुंजाइश है क्योंकि यहां नागरिक और उपभोक्ता जागरूकता का बहुत अभाव है और राजनीतिक तंत्र वित्तीय शक्तियों के समक्ष आत्म समर्पण कर चुका है। यह आत्म समर्पण वैचारिक स्तरों पर तो है ही, बहुत हद तक नैतिक स्तरों पर भी है।

तो…इस देश के 50 करोड़ लोगों के स्वास्थ्य बीमा का प्रीमियम अगर सरकार ही देने को तैयार हो जाए तो बीमा व्यवसाय के तो वारे-न्यारे होने तय हैं।

अब…जब अंतिम के 50 करोड़ लोगों का स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम सरकार भरेगी तो ऊपर के 85 करोड़ लोग क्या करेंगे?
भारत की आबादी तो 135 करोड़ है न…?

सबसे ऊपर के 20-25 करोड़ लोगों के लिये तो अपना इलाज या बीमा प्रीमियम कोई खास समस्या नहीं है। लेकिन…अंतिम के 50 करोड़ और ऊपर के 25 करोड़ लोगों के बीच जो 50-60 करोड़ निम्न मध्य वर्गीय लोग हैं, वे क्या करेंगे? उनका प्रीमियम तो कोई सरकार नहीं भरने वाली।

तो…ये 50-60 करोड़ लोग मजबूरन अपना प्रीमियम खुद जमा करेंगे क्योंकि बीमार पड़ने पर इलाज के लिये यही रास्ता प्रधान होगा। सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की कब्र पर निजी तंत्र की ऊंची होती मीनारों के दौर में निम्न मध्य वर्गीय लोगों के सामने स्वास्थ्य बीमा का कोई विकल्प नहीं होगा।

जाहिर है, बीमा कंपनियों के पौ-बारह हैं। बीमा क्षेत्र के अधिकतम निजीकरण के प्रयास यूँ ही नहीं हैं। देश और दुनिया की बड़ी वित्तीय शक्तियों के दांव इस पर लगे हैं। लूट की हद तक मुनाफा…वह भी गारंटिड। करना केवल यह होगा कि सत्ता-संरचना की छाया में गरीबों की आंखों में धूल झोंकना होगा। इसमें तो कंपनियों को महारत हासिल है।
बीते ढाई-तीन दशकों में भारत में जो अरबपति बने हैं, खरबपति बने हैं, उनमें से अधिकांश की सफलताओं का राज यही है कि उन्होंने पब्लिक को चूना लगाया, नेताओं-अधिकारियों की मिलीभगत से सरकार को चूना लगाया और अपनी संपत्ति में बेहिंसाब इज़ाफ़ा करते रहे।

बीते दशक में हमारे देशी कारपोरेट का जो मौलिक चरित्र उभर कर सामने आया है वह आशंकित करता है। उससे भी अधिक डरावना है सत्ता पर उनका बढ़ता प्रभाव, राजनीतिक शक्तियों को अपने अनुकूल नियंत्रित करने की उनकी बढ़ती शक्ति।

निजी स्कूलों की मनमानियों और मुनाफाखोरी के शिकार हो रहे मध्य और निम्नमध्यवर्गीय लोगों ने अब तक क्या कर लिया? वे सिर्फ खीजते हैं और अत्यंत विवश भाव से ऐसे शुल्क भी भरते रहते हैं जिसका कोई औचित्य नहीं। वे अपनी लूट को अपनी नियति मान चुके हैं।

यही बेचारगी स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बढ़ेगी। लोग विकल्पहीन होते जाएंगे। निजी अस्पताल, बीमा कंपनी और दवा कंपनियों का नेक्सस कितना लूट मचाएगा, यह देखने-झेलने के लिये हमें तैयार रहना होगा।

टैक्स पेयर के पैसे सरकारी अस्पतालों के विकास और विस्तार में न लगा कर बीमा योजना के माध्यम से निजी क्षेत्र को हस्तांतरित करने का उपक्रम गहरे संदेह पैदा करता है।

आज नहीं तो कल…सभ्यता इस पर पश्चाताप करेगी कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा को मुनाफा की संस्कृति के हवाले कर देना बहुत बड़ी गलती थी।
गरीबों के लिये सरकारी अस्पतालों का कोई विकल्प नहीं जहां वे अधिकार से जा सकते हैं, इस बात से निश्चिंत रह सकते हैं कि उन्हें लूटा नहीं जा रहा, मुनाफा बढाने के लिये किसी तरह का छल नहीं किया जा रहा उनके साथ…। साधन संपन्न सरकारी अस्पताल और उपलब्ध सरकारी डॉक्टर इस देश के गरीबों का सबसे बड़ा कल्याण है।
गंभीर बीमारियों के लिये बीमा योजनाओं को प्रोत्साहित करना अलग बात है और यह होना चाहिये, लेकिन पूरे स्वास्थ्य का जिम्मा बीमा के हवाले कर देना, प्रकारान्तर से निजी अस्पतालों पर सरकारी धन लुटाना…यह स्वीकार्य नहीं।

भारत में नए-नवेले विकसित हुए निजी अस्पताल तंत्र की अमानवीय मुनाफाखोरी के किस्से आम हैं, भुक्तभोगियों की संख्या अपार है। लेकिन, व्यवस्था की जकड़ में लोग विवश हैं और…सबसे खतरनाक यह कि यह विवशता बढ़ती जा रही है।

कोई जाल है…जिसमें सम्पूर्ण मानवता उलझती जा रही है।”

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